Friday, January 7, 2011

खोने और पाने के बीच ....





क्यूँ लगता है
खोने और पाने के बीच ,
खोने का पलड़ा भारी है !
रिश्ता है पर
भूला सा जाता है ,
बूँदें चेहरे पर
ढलक जाती हैं
और
एक साया सा घिरता आता है !
मीठी बातें ,
हंसी ठिठोली
तन्हाई बन जाती हैं !
शायद -
ध्रुव है ,
खोने और पाने के बीच ,
खोने का पलड़ा भारी है !





प्रियंका राठौर



Monday, January 3, 2011

चुप - चुप - चुप ......






चुप - चुप - चुप , चुप - चुप - चुप
हम तुम दोनों , क्यों हैं चुप ...
सर्द रात की स्याही में ,
कहीं चांदनी छिटक आई है ,
नन्हें - नन्हें तारों बीच ,
कहीं ध्रुव तारे ने आवाज लगाई है ,
अब तो धुंध भी छटने को है ,
फिर भी -
हम तुम दोनों , क्यों हैं  चुप ,
चुप - चुप - चुप , चुप - चुप - चुप ....


छा रही है लालिमा गगन में ,
चिड़ियों ने अपनी तान लगाई है ,
मंदिर के घंटों के बीच ,
कहीं आरती की आवाज आई है ,
अब तो कोलाहल होने को है ,
सूर्य का तेज तपिश बनने को है ,
फिर भी -
हम तुम दोनों , क्यों है चुप ,
चुप - चुप - चुप , चुप - चुप - चुप ....


रंग बिरंगे उपवन में ,
कही कलियों की सुगंध भरमाई है ,
मंद बयार के झोकों बीच ,
कहीं उम्मीद नजर आई है ,
अब तो वक्त बदलने को है ,
खुशियाँ आँगन भरने को हैं ,
फिर भी -
हम तुम दोनों , क्यों हैं चुप ,
चुप - चुप - चुप , चुप - चुप -चुप
चुप - चुप - चुप , चुप - चुप -चुप ..........





३१ दिसम्बर की वह सर्द रात ...जब एक ओर अस्पताल में जीवन और म्रत्यु का संग्राम हो रहा था तो दूसरी ओर नये साल का आगाज था .....तभी उस संग्राम में जीवन का विजयी उद्घोष हुआ ....ऐसे पलों में भावों की अभिव्यक्ति शब्दों में ढल गयी ....जो आप सबके सामने है .....

आप सभी को नव वर्ष मंगलमय हो .....



प्रियंका राठौर



Wednesday, December 29, 2010

जीवन और म्रत्यु .....





अजब निराला खेल है
जीवन और म्रत्यु का
क्यों होता है अक्सर
म्रत्यु का पलड़ा भारी !
जीवन है कठिन और
म्रत्यु आसान -
आज वह है
कल नहीं होगा
क्या पता अभी
कुछ पलों में ही
निगल ले कालचक्र उसको
यही तो शाश्वत सत्य है
जीवन का !
अगर है जीवन निश्चित
तो उतनी ही म्रत्यु ध्रुव
फिर क्यों ये अवसाद !
होकर भयाक्रांत
इस खेल से -
नहीं है रुकना !
अगर एक म्रत्यु ही है
कई जीवन ज्योति
तो हाँ स्वीकार है
यह शिव ,
जो है कटु सत्य
शायद -
"सत्यम शिवम् सुन्दरम " .......



प्रियंका राठौर



Friday, December 24, 2010

मौन की भाषा ...







सुनी कभी क्या मौन कि भाषा ....
स्वत: स्फुरित मधुर - मधुर ,
बिन बोले ही सब कुछ बोले ,
भेद जिया के खोल दे !
समझ सको तो समझ लो इसको ,
ये तो दिल कि भाषा है ,
कुछ - कुछ में ही है सब कुछ ,
प्रेममयी जीवन रस धरा है !
सुनी कभी क्या मौन कि भाषा ...
स्वत: स्फुरित ये मौन की भाषा ...
शब्द रहित ये मौन की भाषा .....!!




प्रियंका राठौर

Monday, December 20, 2010

बिटिया क्यों होती परायी है ?





सूत्रधार ने रचा जब उसको ,
सोचा नया जीवन संसार बनाएगी ,
अपने आँगन का फूल बन
दुनिया को महकाएगी .....
लेकिन आई बिटिया धरा पर
बनकर परायी अमानत .....
माई कहती जाना है
बिटिया तुझे ससुराल को ,
तू तो है उनकी अमानत ,
सहेजा है बस अपने संसार में !
कन्यादान किया बापू ने
पहुंची बिटिया ससुराल को .....
आई है वह दूजे घर से ,
इसलिए ससुराल में भी वह परायी है ...
जिससे रिश्ता बना जनम जनम का
उससे भी दूजा दर्जा ही पाती है !
मायके में भी है परायी ....
ससुराल में भी है परायी .....
बिटिया क्यों होती परायी है ?
नियति के इस भंवर जाल में ,
बिटिया ही डूबती उतराती है ,
बिटिया देती अपना सब कुछ वार ,
फिर भी परायी अमानत ही रह पाती है ................!!





प्रियंका राठौर

Monday, December 13, 2010

परिवर्तन .....






परिवर्तन  अच्छा है  ,
लेकिन इतना कि ,
अपने - अपने रहें ,
दूसरे ना बन जाएँ !
लहरों के साथ ,
बहना  अच्छा है , 
लेकिन इतना कि ,
बिना भीगे -
दामन साफ़ बच जाये !



प्रियंका राठौर 

Thursday, December 2, 2010





अहसासों में बसता है ,
निगाहों से बयाँ होता है ,
निशब्द बंधन है ,
पर रिश्तों से परे है ,
शायद -
यही प्यार है ,
जो दिखाया नहीं जाता ,
दिख जाता है ,
लम्हों में सिमट जाता है ,
रूह की झंकार है ,
जीवन की आस है ,
भावों का गुंथन है ,
हाँ -
यही प्यार है ,
जो शब्दों से परे ,
अभिव्यक्ति है समर्पण रूप ......!!




प्रियंका राठौर