Sunday, September 11, 2011

वजूद ...




सीमित दायरों
में बंध
जीवन हो गया
निरुत्तर प्रश्न ......

खोज - खोज
कर मायनों को
वजूद ही
हो गया
अंतिम प्रश्न ........


प्रियंका राठौर

Thursday, September 8, 2011

कितना मुश्किल है ....






कितना मुश्किल है ....
खुद को सहेजना
खुद को समेटना
उन भेदती हुयी
निगाहों से
जो जिस्म क्या
अंतस को भी
आर - पार
छील देती हैं .....
जिसके बाद -
सिर्फ शेष
रह जाता है ....
रिसता हुआ खून
और
ना भर पाने वाले जख्म ......!!!!



प्रियंका राठौर

Tuesday, September 6, 2011

सन्नाटा....





रात के सन्नाटे को
चीरती हुयी यादें
गोधुलि की तरह
हाँ और ना के बीच में
अँधेरा ही दे जाती है !
पल -पल का इन्तेजार था
दुःख में भी
सुख का अहसास था
एक अनमोल मुक्ताहार था
फिर भी ना जाने क्यों आज
तड़पन ही नजर आती है
रात के सन्नाटे को
चीरती हुयी यादें बबंडर की तरह
जीवन ही डुबो जाती हैं !!


प्रियंका राठौर

Saturday, September 3, 2011

मेहँदी




 
 
खूब है रंग मेहँदी का
आज तेरे हाथों में
क्योकि - सजा है नाम
मेरे उनका
तेरे हाथों में .....
हैं दुआएं अब मेरी
साथ तेरे हर पल
क्योकि -
जुड़ गया है
नाम तेरा उनके नाम में .......
अब तो हर क्षण
तुम ही उनके साथ नजर आओगी
जीवन के हर डगर पर
उनकी अर्धागनी कहलाओगी
कहती हूँ कुछ शब्दों को तुमसे
सखी समझ कर रखना मान
अब तो सात फेरों के सातों वचन
ही हो तुम्हारे जीवन का आधार
बन जाये सिन्दूर  ही अब
तुम्हारे जीवन का श्रंगार
हम साया होगी अब तुम उनकी
नम ना होने देना कभी आँखें उनकी
उनके घर आँगन का रखना ध्यान
उनकी आन है अब तुम्हारे हाथ ...........
खूब है रंग  मेहँदी का 
आज तेरे हाथों में .....
क्योकि जुड़ गया है
नाम तेरा अब उनके नाम में ................



प्रियंका राठौर

Thursday, September 1, 2011

तुम दोनों .....








कितना मुश्किल है
ये हर  वक्त का बहना 
रुकना चाहूँ भी 
तो कैसे रुकूँ ......
तुम दोनों भी तो 
चल रहे  हो 
साथ मेरे 
लेकिन -
अलग अलग छोरों पर .....
जो कभी  मिलोगे 
तुम दोनों 
तभी तो रुक पाऊँगी
अन्यथा यूँही
अनवरत बहना होगा ......
कभी देखती हूँ
उस क्षितिज पर
जहाँ तुम दोनों
दिखते हो मिलते हुए
लेकिन तब
मै नहीं आती
नजर -
ख़त्म हो जाता है
मेरा अस्तित्व ....
पतली सी खिची रेखा
जो तुम दोनों में
ही समा जाती है ........
शायद -
अभी वक्त नहीं है
मेरे लीन होने का
वजूद के समर्पण का .....
तभी तुम दोनों
साथ साथ होकर भी
बहुत दूर हो .....................




प्रियंका राठौर

Sunday, August 28, 2011

विदुषी ....





चेहरे पर बोझिल भाव लिए
आँखों से अभिव्यक्त कर
चली आ रही थी नियमित चक्रानुसार .
द्रष्टव्य हुआ राह में एक कोमल गात
उम्र थी मात्र चार माह की , नाम विदुषी
अरुणलालिमय कपोल थे जिसके
पंखुड़ी सद्र्श सचल अंग .
देख के उसको लगता था
है नया लघु रूपांतरण प्रक्रति का .
बोली मुझसे , नयनों ही नयनों में
क्यों हो तुम बुझी - बुझी सी
जीवन तो है चंचलता का नाम
फिर क्यों तुम बनी अचंचला .
देख मुझे निरुत्तर -
खिलखिलाई और बोली -
अंदाज जीने का सीखो मुझसे
हम और तुम राही हैं , एक ही राह के
तुम अवसाद युक्त और मै................
बेखबर चली जा रही हूँ
इस आस में ,
हर राह की होती है मंजिल .
डगर के प्रत्येक द्रश्य को
कौतूहलता से देखो
तथ्यों में तथ्यों को खोजो
मात्र रोशिनी ही न स्वीकारो
अँधेरे में भी रोशिनी ढूंढो
कल नहीं अभी को सोचो
कर्तव्यपथ पर अडिग रहो ....
इन्ही का ही तो मै समिश्रण हूँ ...
मुझमे प्यार है
मुझसे प्यार है
देती हूँ , लेती हूँ ....
जीवन का हर एक सपना
होता है साकार मेरा
धरा के कण - कण , क्षण - क्षण को जीकर........
कहकर इतना चली गयी वह
ना जाने किस दिशा में
छोड़ मुझे विकलता में
सोचा मैंने -
हाँ - उसी का तो जीवन था
वह नहीं नाममात्र विदुषी
थी बल्कि वह साक्षात् विदुषी ....
महसूस कर उसको
चंचलता का संचार हुआ ...
नए विचारों का उद्गार हुआ
जो दे गए प्रेरणा
सतरंगी संघर्ष की .......................




प्रियंका राठौर

Tuesday, August 23, 2011

मेरी बातें...मेरे शब्द ....





मेरी बातें
मेरे शब्द ......

क्या करूं
जब किसी के
अंतर्मन के
शांत जल में
पत्थर की भांति
गिरते ही
लहरें पैदा कर जाते हैं .......

मेरी बातें
मेरे शब्द .....

क्या करूं
जब किसी  के
अहसासों के
शांत समुन्दर में
चाँद की भांति
ज्वार भाटे पैदा कर जाते हैं ......

मेरी बातें
मेरे शब्द ....

ये तो हैं रोशनी
उस दीपक की
जो जाने वाले
को प्रणाम हैं ......
यह मद्धम तो है
पर अँधेरे से दूर है .....
खुशियों का सागर
तो नहीं
पर आस की डोर हैं .......

मेरी बातें
मेरे शब्द .....
क्या करूं
जब किसी की
आत्मा को ही
झिंझोर जाते हैं .......

मेरी बातें
मेरे शब्द .......




प्रियंका राठौर