Tuesday, September 27, 2011
Monday, September 19, 2011
बीते वक्त के तम में ......
गया था खो , कुछ
बीते वक्त के तम में .....
यहाँ ढूँढा , वहां ढूँढा
चारो ओर ढूंढ का शोर ....
हुयी विस्मृत -
खोज ही खोज में
क्या खोया था
बीते वक्त के तम में ....
युगों - युगों के बढ़ते क्रम में
थापों का झंकृत संगीत
संसार इंद्रधनुषी रंगों का
सिमट गया
अनुभव स्पर्शित बेल में ....
हुयी स्म्रति -
जो खोया था तम में
समक्ष खड़ा है
एक नवीन रूप में
शायद -
मिल गया वह सब कुछ
गया था खो , जो
बीते वक्त के तम में ...... !!!!
प्रियंका राठौर
Sunday, September 11, 2011
Thursday, September 8, 2011
Tuesday, September 6, 2011
Saturday, September 3, 2011
मेहँदी
खूब है रंग मेहँदी का
आज तेरे हाथों में
क्योकि - सजा है नाम
मेरे उनका
तेरे हाथों में .....
हैं दुआएं अब मेरी
साथ तेरे हर पल
क्योकि -
जुड़ गया है
नाम तेरा उनके नाम में .......
अब तो हर क्षण
तुम ही उनके साथ नजर आओगी
जीवन के हर डगर पर
उनकी अर्धागनी कहलाओगी
कहती हूँ कुछ शब्दों को तुमसे
सखी समझ कर रखना मान
अब तो सात फेरों के सातों वचन
ही हो तुम्हारे जीवन का आधार
बन जाये सिन्दूर ही अब
तुम्हारे जीवन का श्रंगार
हम साया होगी अब तुम उनकी
नम ना होने देना कभी आँखें उनकी
उनके घर आँगन का रखना ध्यान
उनकी आन है अब तुम्हारे हाथ ...........
खूब है रंग मेहँदी का
आज तेरे हाथों में .....
क्योकि जुड़ गया है
नाम तेरा अब उनके नाम में ................
प्रियंका राठौर
Thursday, September 1, 2011
तुम दोनों .....
कितना मुश्किल है
ये हर वक्त का बहना
रुकना चाहूँ भी
तो कैसे रुकूँ ......
तुम दोनों भी तो
चल रहे हो
साथ मेरे
लेकिन -
अलग अलग छोरों पर .....
जो कभी मिलोगे
तुम दोनों
तभी तो रुक पाऊँगी
अन्यथा यूँही
अनवरत बहना होगा ......
कभी देखती हूँ
उस क्षितिज पर
जहाँ तुम दोनों
दिखते हो मिलते हुए
लेकिन तब
मै नहीं आती
नजर -
ख़त्म हो जाता है
मेरा अस्तित्व ....
पतली सी खिची रेखा
जो तुम दोनों में
ही समा जाती है ........
शायद -
अभी वक्त नहीं है
मेरे लीन होने का
वजूद के समर्पण का .....
तभी तुम दोनों
साथ साथ होकर भी
बहुत दूर हो .....................
प्रियंका राठौर
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