बादलों की आवाजाही के बीच आज धूप बहुत उजली थी .... उफ़क से आई थी , बिल्कुल तुम्हारी उस झक सफ़ेद कमीज की तरह , जिसके बटन में कभी मेरा इक बाल अटका था ...... ! प्रियंका राठौर
कल रात फिर तेज बारिश हुयी थी , और बूँद बूँद से टपकते तुम मेरे अहसासों को पूरा तर कर गए | अब - सुबह गीली है , आत्मा की नमी बिस्तर के सिरहाने पड़ी है | दिमाग का सूरज अहसासों के बादल से बाहर नहीं आना चाहता , आज फिर मुझे 'तुम' होकर ही दिन गुजारना होगा | प्रियंका राठौर
आज फिर - हथेलियों से उन्हीं लम्हों को छुआ , जिन्हें कभी हमने साथ जिया था | पता नहीं - तुम्हें ढूँढा या खुद को पाया , लेकिन - मन का झोला अभी भरा भरा सा है | कह नहीं सकती - तुम्हारे अहसासों से या फिर दर्द की कतरनों से .... या शायद - दोनों ही से ...... !