आज फिर - हथेलियों से उन्हीं लम्हों को छुआ , जिन्हें कभी हमने साथ जिया था | पता नहीं - तुम्हें ढूँढा या खुद को पाया , लेकिन - मन का झोला अभी भरा भरा सा है | कह नहीं सकती - तुम्हारे अहसासों से या फिर दर्द की कतरनों से .... या शायद - दोनों ही से ...... !
बहुत सुंदर.
ReplyDeleteनई पोस्ट : छठी इंद्री (सिक्स्थ सेंस) बनाम खतरे का संकेतक
बहुत लाजवाब ... छूने से लम्हों में जान आ जाती है ... प्रेम महक उठता है ...
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद .... !
ReplyDeleteYour words are too effective.
ReplyDeleteThanks for delivering these types of poems.