Wednesday, December 29, 2010

जीवन और म्रत्यु .....





अजब निराला खेल है
जीवन और म्रत्यु का
क्यों होता है अक्सर
म्रत्यु का पलड़ा भारी !
जीवन है कठिन और
म्रत्यु आसान -
आज वह है
कल नहीं होगा
क्या पता अभी
कुछ पलों में ही
निगल ले कालचक्र उसको
यही तो शाश्वत सत्य है
जीवन का !
अगर है जीवन निश्चित
तो उतनी ही म्रत्यु ध्रुव
फिर क्यों ये अवसाद !
होकर भयाक्रांत
इस खेल से -
नहीं है रुकना !
अगर एक म्रत्यु ही है
कई जीवन ज्योति
तो हाँ स्वीकार है
यह शिव ,
जो है कटु सत्य
शायद -
"सत्यम शिवम् सुन्दरम " .......



प्रियंका राठौर



Friday, December 24, 2010

मौन की भाषा ...







सुनी कभी क्या मौन कि भाषा ....
स्वत: स्फुरित मधुर - मधुर ,
बिन बोले ही सब कुछ बोले ,
भेद जिया के खोल दे !
समझ सको तो समझ लो इसको ,
ये तो दिल कि भाषा है ,
कुछ - कुछ में ही है सब कुछ ,
प्रेममयी जीवन रस धरा है !
सुनी कभी क्या मौन कि भाषा ...
स्वत: स्फुरित ये मौन की भाषा ...
शब्द रहित ये मौन की भाषा .....!!




प्रियंका राठौर

Monday, December 20, 2010

बिटिया क्यों होती परायी है ?





सूत्रधार ने रचा जब उसको ,
सोचा नया जीवन संसार बनाएगी ,
अपने आँगन का फूल बन
दुनिया को महकाएगी .....
लेकिन आई बिटिया धरा पर
बनकर परायी अमानत .....
माई कहती जाना है
बिटिया तुझे ससुराल को ,
तू तो है उनकी अमानत ,
सहेजा है बस अपने संसार में !
कन्यादान किया बापू ने
पहुंची बिटिया ससुराल को .....
आई है वह दूजे घर से ,
इसलिए ससुराल में भी वह परायी है ...
जिससे रिश्ता बना जनम जनम का
उससे भी दूजा दर्जा ही पाती है !
मायके में भी है परायी ....
ससुराल में भी है परायी .....
बिटिया क्यों होती परायी है ?
नियति के इस भंवर जाल में ,
बिटिया ही डूबती उतराती है ,
बिटिया देती अपना सब कुछ वार ,
फिर भी परायी अमानत ही रह पाती है ................!!





प्रियंका राठौर

Monday, December 13, 2010

परिवर्तन .....






परिवर्तन  अच्छा है  ,
लेकिन इतना कि ,
अपने - अपने रहें ,
दूसरे ना बन जाएँ !
लहरों के साथ ,
बहना  अच्छा है , 
लेकिन इतना कि ,
बिना भीगे -
दामन साफ़ बच जाये !



प्रियंका राठौर 

Thursday, December 2, 2010





अहसासों में बसता है ,
निगाहों से बयाँ होता है ,
निशब्द बंधन है ,
पर रिश्तों से परे है ,
शायद -
यही प्यार है ,
जो दिखाया नहीं जाता ,
दिख जाता है ,
लम्हों में सिमट जाता है ,
रूह की झंकार है ,
जीवन की आस है ,
भावों का गुंथन है ,
हाँ -
यही प्यार है ,
जो शब्दों से परे ,
अभिव्यक्ति है समर्पण रूप ......!!




प्रियंका राठौर




Tuesday, November 23, 2010

तुम बिन ...




निधि जी आपके अनुरोध पर 'तुम बिन' नये कलेवर में ......




तुम बिन सब सूना है ,
ये कमरा और ये गलियारा,
लगता है हर आहट पर,
तुम थे हाँ तुम ही तो थे,
हर पल का साथ याद आता है,
लेकिन फिर....होता है महसूस ,
तुम तो बहुत करीब  हो ,
हमारे अहसासों के बीच हो,
तुम ही तो हो ,
बेबो की किलकारी में,
चिड़ियों की कलरव में,
आसमान की स्याही में,
हवा की ठंडक में ,
हाँ , तुम ही तो हो-
सूरज की पहली धूप में,
घुंघरू की रुनझुन में,
मंदिर के घंटें में ,
और ईश्वर की प्रार्थना में !
तुम तो एहसास हो-
हर दम हर पल साथ हो
फिर क्यों ?
तुम बिन सब सूना है
ये कमरा और ............................!!!



प्रियंका राठौर

Saturday, November 20, 2010

एक चादर है सूनेपन की......






एक चादर  है सूनेपन की
साथ होने पर भी
तन्हाई है ..
क्या यही प्यार है ?
शायद -
प्यार और तन्हाई ही
धागा और मोती हैं ..
सब कुछ है ,
पर कुछ भी नहीं है !
एक चादर है सूनेपन की
साथ होने पर भी
ख़ामोशी है ..
क्या यही प्यार है ?
शायद नहीं -
प्यार अंतस से होता है
और जब होता है
रंगों का समां होता है ..
खो जाती है तन्हाई और ख़ामोशी
पर शायद -
एक चादर है सूनेपन की
साथ होने पर भी
तन्हाई है , ख़ामोशी है ..............





प्रियंका राठौर




Monday, November 15, 2010

अश्रु बिंदु ....





दिल ने दी चुपके से मन को दस्तक ,
मन ने सोचा ,समझा और अहसास कर ,
ढाल दिया अपने वजूद को ,
नेत्रों में बनाकर अश्रु बिंदु जल !
आकर हथेली पर अश्रु ने ,
पूछा मुझसे प्रश्न -
"मै तो हूँ तुम्हारा ही अंश -
दिलों की भावना ,
मन की कल्पनाशीलता से ,
निर्मित मूक प्रेम की स्मृति !
फिर आज ऐसा क्या हुआ -
जो तुमने मुझे पृथक किया ?"
प्रश्न का जाल छटपटाहट रूप में
था समक्ष उपस्थित ..
निरुत्तर - उत्तर ही था सामने ..
कहा मैंने उससे -
पृथक होकर भी ,
नहीं किया पृथक तुम्हे ,
मुझसे तुम हो , तुमसे मै,
प्रमाणित अस्तित्व तुम ,
और वेदना हूँ मै !
फिर भी तुम क्यों
नहीं समझ सकते हो ?
मात्र शरीर को छोड़ देने से ,
तुम नहीं हो गए अस्तित्वहीन ,
तथापि अब तो तुम हो ,
और भी करीब ,
यहीं कहीं अहसासों में ,
सांसों में ,
हर क्षण - हर पल
हर क्षण - हर पल !!




प्रियंका राठौर

Wednesday, November 10, 2010

हो गयी मै तो जोगन रे......







हो गयी मै तो जोगन रे ,
छोड़ चुनरिया लाज शरम की ,
अपनी सुध - बुध खोयी रे !
अंजन छूटा , छूटी मेरी बिंदिया रे ,
कंगन टूटा , रूठी पाजेब की झंकार रे ,
लाल लूगड़ा ज्वाला लागे ,
श्रंगार तड़पन बन जाये रे ,
विरहन की अग्नि में जल - जल ,
हो गयी तेरी परछाई रे !
हैं सांसें अब मद्धम - मद्धम ,
जीवन मेरा छूटा जाये रे ,
ओढ़ ओढ़नी जोग की तेरी ,
हो गयी मै तो जोगन रे !!




प्रियंका राठौर

Tuesday, November 9, 2010

मन पर नियंत्रण....

मानव-जीवन के समस्त क्रियाकलाप एवं रचना-संसार का हमारा अपना मन ही मूलाधिष्ठान होता है। मनोनिग्रह का अर्थ है मन की वृत्तियों का निग्रह या मन को बस में करना। हमारे इस मन की चतुर्विध वृत्तियां होती है-मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। मन के तीन उपादान है-सत्, रज और तम। संपूर्ण भौतिक और मानसिक क्रियाओं में हमारा मन एक रूप में कभी नहीं रहता है। इन्हीं तीनों उपादानों से हम संचालित होते है। सत हमें सद्गुणों की ओर ले जाकर ज्ञान और आनंद देता है। कार्यो में उत्कृष्टता लाता है तथा मन ही संकल्पशक्ति को धैर्य प्रदान करता है। यह दैवीय गुणों की प्रतिष्ठापना में योगदान देता है। जबकि रज का प्रभाव काम का प्राबल्य, क्रोध और लोभ की उत्पत्ति करता है। रजोगुण से पाप की उत्पत्ति होती है।
हर व्यक्ति स्वभाव, आचरण और व्यवहार तथा कार्य में एक सा नहीं होता है। उसके मूल में इन तीन गुणों की मात्राओं के सम्मिलित तथा हेरफेर से भिन्नता परिलक्षित होती है। मन का तीसरा और अंतिम उपादान है-तम। तम जड़ता का तत्व है, निष्क्रियता का प्रतीक है। इसी तम के बाहुल्य से व्यक्ति में अवसाद उत्पन्न होता है। तम हमारे मन को बिखेरकर आलसी और अकर्मण्य बना देता है। सत् हमारे पुण्यों का उत्पादक होता है। रज क्रियाशीलता, काम-वासना और पापों की ओर प्रवृत्त करता है। तम निष्क्रियता को बढ़ाकर न पुण्य का अर्जन करता है और न पाप का। जिस व्यक्ति ने अपने मन को अपने अधीन बना लिया, वह मनोनिग्रह में कदम रखने में सक्षम हो सकता है, क्योंकि कहा गया है कि जिसका मन नियंत्रित है वही मानसिक रूप से मानसिक रोगों से मुक्त रहेगा और मानसिक रोगों से मुक्तिपाने पर शारीरिक पीड़ाओं से भी दूर रहेगा। मनोनिग्रही, व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास पाने का पक्षधर होगा। उसका मन उसके नियंत्रण में होने से भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का वरण करेगा। मन को अपने बस में करने वाला ही संसार को जीतने की साम‌र्थ्य रख सकता है। मनोनिग्रही व्यक्ति दैवीय गुणों से आपूरित होने पर ही समाज का और राष्ट्र का कल्याण कर सकने में समर्थ हो सकता है। साथ ही आध्यात्मिक जगत की शक्ति पाने के लिए सक्षम होता है। मन की चंचल वृत्ति को निग्रहीत करना ही मनोनिग्रह है।




साभार : दैनिक जागरण

Thursday, November 4, 2010

दीप का प्रकाश




स्वयं को जलाकर दूसरों को प्रकाश देने वाला दीपक कहा जाता है। स्वार्थ से दूर रहकर लोकमंगल का शाश्वत अनुष्ठान इस चेतना का मूल मंत्र है। दूसरों की पीड़ा दूर करने के लिए तिल तिल जलना ही जीवन दीप बनाता है। ज्योतित करने वाला आलोक पर्व श्रद्धा का मंगल विधान है। आशा की लौ जगाकर निराशा का तम दूर करता है दीपावली का पर्व। केवल अपने आंगन में ही नहीं वंचितों, दीन-हीनों के घर में भी दीप जलाने से यह पर्व संस्कृति का अंग बनता है। लक्ष्मी के हाथ का अमृत पीने से हमें जीवन की पूर्णता नहीं मिलेगी। लक्ष्मी और सरस्वती में बैर नहीं है। प्रकाश मानव जीवन का पावन प्रतीक है। तमसो मा ज्योतिर्गमय का उद्बोधन उपनिषद का है। इसी से जुड़ा है सत्यमेव जयते। हृदय की करुणा और संवेदना के बिना दु:खियों का दु:ख हटा पाना कठिन है। मंगल विधान के दो भाव है-करुणा और प्रेम।
प्रेम रंजन की ओर मोड़ता है तो करुणा रक्षा की ओर। किसी को अपना मान लेना ही करुणा है। दीप का सार्वभौमिक रूप सर्वकालिक और सनातन है। एक दीप दूसरे दीप के नीचे का अंधकार दूर करता है। ऋग्वेद में वर्णित है कि ऋतु और सत्य पहले उद्भूत हुए। रात्रि और उसके बाद समुद्र संवत्सर आदि उत्पन्न हुए। मैत्रेय उपनिषद में आया है-तमोबाहदमग्र आसीदेवम्। सर्वप्रथम यह सब एकाकी तम था अर्थात् तमोगुणी अंधकार था। कालांतर में इससे रज और सत्व हुए। एकता, समरसता और समानता के संगम से मानवीय मूल्यों का समावेश होता है। दीपों की पंक्तियां जब तक हर घर में नहीं जलेंगी तब तक मानवता में पूर्ण प्रकाश और शांति असंभव है। दीपावली से अनेक महापुरुषों का तादात्म्य होने के कारण इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया। धर्म, कर्म, ज्ञान, अध्यात्म की अलौकिक मंगल कामना दीवाली का पर्याय है। जीवन में ज्योति का तात्पर्य है जागतिक दु:ख से निवृत्ति पाकर परमानंद प्राप्त करना है। अंधकार दु:ख है और प्रकाश सुख। प्रेम में ही इस पर्व की सार्थकता है। विश्वबंधुत्व की आधारशिला है दीप का प्रकाश। यह पर्व केवल ज्ञान की ज्योति, विद्या की किरण फैलाने आता है। दीपावली पर्व से अच्छे कार्य आरंभ किए जाते है। दीपावली सद्कर्म सद्गुण की ओर प्रेरित करती है।



साभार : दैनिक जागरण

Tuesday, November 2, 2010

इच्छाओं-कामनाओं से मुक्ति.....

 


ऋषियों-मनीषियों ने मनुष्य की असीम इच्छाओं-कामनाओं को देखा, फिर एक सच्चे पारखी की तरह इस मन को परखा और निर्णय दिया कि मन ही इच्छाओं का केंद्र बिंदु है, उसका जनक और पोषक है। तब उन्होंने दृढ़ निश्चय, दृढ़ विश्वास के साथ यह निर्णीत किया कि मन ही बंधन का कारण है- 'मन एवं मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयो।'' मनीषियों ने इस बंधन से मुक्ति का उपाय भी बताया कि मन को निर्विषय कर देना ही मुक्ति-पथ का बोध है। मन का निरोध ही योग है।
चित्त की चार स्थितियां है-करुणा, मैत्री, मुदिता और उपेक्षा। अपने से कमतर लोगों के प्रति करुणा का भाव, अपने सम स्तरीय के प्रति मैत्री का भाव, जो अपने से वरेण्य है उनके साथ मुदिता का भाव और जो दुष्ट प्रवृत्ति के है उनके प्रति उपेक्षा का भाव, इन स्थितियों को पा लेना ही जीव का लक्ष्य होना चाहिए। यदि चित्त को स्थिर कर लिया जाये तो ही जीव इन स्थितियों को प्राप्त कर पाता है। मन, बुद्धि पर विजय पा लेता है, यही योग है। 'भगवत गीता' में भी इसी आध्यात्मिक उपलब्धि का तुमुल घोष है। भगवान वेदव्यास ने भी 'योग: चित्तवृत्ति निरोध:' की बात कही है। उनके अनुसार व्यापक मन की नकारात्मक चिंतन-झंझा को थामना ही योग है। यहां सकारात्मक एवं लोकोपकारी चिंतन के निषेध की बात नहीं कही गई है, बल्कि केवल इंद्रिय-लोलुप, नकारात्मक एवं मूल्य विनाशक वृत्ति अर्थात् विचारों की झंझा को निरुद्ध करने की बात कही गई है, किंतु निश्चित रूप से यह साधना बहुत कठिन है, इसका वाह्यं-विलास से कुछ भी लेना देना नहीं है। साधक ज्ञान, भक्ति एवं योग के अनवरत अभ्यास से इसकी प्राप्ति करता है। ऐसे मनीषियों को आप्तऋषि कहा गया है। इस साधना का मंच संसार नहीं है। त्रिविध एषणाओं से मुक्त साधक ही इसकी मंजिल तक पहुंचकर आत्मोद्धार एवं जनोद्धार कर सकता है। भले ही हम कबीर, तुलसी आदि न बन सकें, पर अपने इस जन्म में इस दिशा में कदम तो बढ़ा ही सकते है। यदि हमने मन पर थोड़ा संयम रखना सीख लिया तो धीरे-धीरे अभ्यास से मन को निर्विषयी भी बना सकेंगे और चित्त स्थिर होगा।



साभार : दैनिक जागरण

Sunday, October 31, 2010

अब तो दर्शन देदे कान्हा ......





अब तो दर्शन देदे कान्हा
गयी हार मै पंथ निहार के !
ढूंढा तुझको वन उपवन में ,
ताल सरोवर , घर - आंगन में ,
पूछ - पूछ कर हर आहट से ,
भाग रही , पीछे परछाई के !
अब तो दर्शन देदे कान्हा .......
अंखियों में है अश्रु धरा ,
सांसों में है प्रीत की ज्वाला ,
तन है गीला , मन भी गीला ,
अधरों पर बस तेरा नाम रे !
अब तो दर्शन देदे कान्हा
गयी हार मै पंथ निहार के !!



प्रियंका राठौर

Saturday, October 30, 2010

एक रीतापन है......






एक रीतापन है ,
साँझ की ओट में छिपता सा ,
अंधकार से बचता सा ,
झूठी रुनझुन ,
झूठी जगमग ,
सबमे खोता सा ,
एक रीतापन है -
स्याही के बीच ,
दागों से बचता सा ,
कलम की ओट में छिपता सा ,
गहराई और यादों के बीच ,
एक रीतापन है .......!


(रीतापन - खालीपन )



प्रियंका राठौर

Friday, October 29, 2010

कोई हो गया गुम....





कोई हो गया गुम,
अब तक तो था ,
लेकिन अचानक -
आया तूफान ,
स्तब्धता को चीर देने वाला ,
काले घने मेघों ने भी ,
बहाए आंसू,
और कोई हो गया गुम !
ठगा सा रह गया ,
कोई उपाय भी -
नजर ना आया ,
फिर सोचा -
किसी के जाने से ,
नियति चक्र तो नहीं रुकता ,
एक गया तो दूसरा आया ,
वह रूप नहीं तो ,
दूसरा रूप सही ,
एक के बाद एक ,
ना जाने कितने स्वरूप !
और -
कोई हो गया गुम !!





प्रियंका राठौर

Wednesday, October 27, 2010

तेरे होने से.......






तेरे होने से ,
खुशियाँ नजर आती हैं ,
सपनों की सुंदर लड़ियाँ ,
बिखर सी जाती हैं ,
तारों की चमक - 
अपनी सी लगती है ,
कही अंदर एक किरण
झिलमिला सी जाती है !
शायद आज -
भावों का सही मतलब
समझ पाई हूँ !
क्या होता है पवित्र भाव ,
अंतस से देख पाई हूँ !
होने ना होने पर भी ,
होने का अहसास ,
महसूस कर पाई हूँ !
दूरी में भी
नजदीकी नजर आती है ,
सपनों की सुंदर लड़ियाँ
बिखर सी जाती हैं ..........!




प्रियंका राठौर




Tuesday, October 26, 2010

दीपक






बनना है मुझको -
दीपक समान ,
जो जलता है स्वयं
पर देता है जग को ज्योति  दान !
जलना है मुझको ऐसे
दे सकूं मै जग को जीवन दान !
इसलिए -
खुद मिटकर
रखना होगा जग को जिन्दा ,
यही है मेरा धर्म ,
यही है मेरा कर्तव्य ,
और यही है -
मेरा जीवन लछ्य !




प्रियंका राठौर

Friday, October 22, 2010

चाँद पे दाग है ....





चाँद पे दाग है .....
सुहागिन का श्रंगार है ,
प्रियतम का इंतजार है ,
माँ का लाल है ,
फिर भी -
चाँद पे दाग है .....
आसमान का ताज है ,
अँधेरे की आस है ,
चकोर की प्यास है ,
फिर भी -
चाँद पे दाग है .....!!



प्रियंका राठौर


न्रात्यांगना







"आदर्शवादिता के घुंघरू बांध ,
ओढ़ ध्येय की चूनर ,
संकल्प नियमितता का कर श्रंगार ,
संघर्ष का नर्तन करना है ,
समर्पण रूप भावों की अभिव्यक्ति कर ,
श्रेष्ठ न्रात्यांगना   अब बनना है ....."





प्रियंका राठौर

बड़ी दूर







बड़ी दूर क्या कुछ भी नहीं ?
नहीं !
किरण है , आस है , पल है , क्षण है ,
खेल है , इन्ही शब्दों का !
बड़ी दूर -
बस यही है ,
        यही है ,
        यही है .....................!!





प्रियंका राठौर

Tuesday, October 19, 2010

"श्वेत समर्पण "






"दृष्टिहीन  का
कल्पित रंग -
"श्वेत समर्पण "
जैसे -
आस हो कोपल की
बंजर में !
बहाव नीर का हो
अंजलि में !
सर्व समर्पित
श्वेत समर्पण ..........
श्रद्धांजली अर्पित
श्वेत समर्पण .........."





प्रियंका राठौर


बारिश की बूंदें......






रिमझिम बारिश की बूंदें ,
तुम्हारी बातों की तरह ,
मन को भिगो रही हैं !
बिजली की चमक में ,
कही तुम्हारी -
हंसी की मिठास है !
हवा की ठंडक में ,
कही तुम्हारे -
अनछुए स्पर्श का आभास है !

रिमझिम बारिश की बूंदें ,
तुम्हारी यादों की तरह ,
तन को भिगो रही है !
बादलों की गड़गड़ाहट में ,
कही तुम्हारे-
होने का अहसास है !
पत्तों  के कम्पन  में ,
कही तुम्हारी -
बाँहों  में  सिमटने  की आस है !

रिमझिम बारिश की बूंदें ,
तुम्हारी बातों की तरह .........!!





प्रियंका  राठौर  

Monday, October 18, 2010

एक रिश्ता है......







एक रिश्ता है
अनजाना सा ,
जो परे है नाम से !
बांधा है ,
प्रीत की डोर से जिसने ,
बंधन स्नेह का ,
सब कुछ है -
फिर भी नहीं है कुछ !
डूबते उतराते भावों में ,
उलझनों का सैलाब है !
हाँ और ना के बीच
एक रिश्ता है
अनजाना सा .......

कोशिश ना की
हाँ में बदल जाती है ,
कोपल की डोर उसे ,
मजबूत बना जाती है !
भावों का गुंथन है ,
शब्द से परे है
पर -
एक रिश्ता है ,
अनजाना सा ,
जो परे है नाम से .......!!






प्रियंका राठौर


दस्तक






नहीं जानती जीवन में तेरे ,
किस मोड़ तक दस्तक दे पाती हूँ ,
पर अपने अन्दर कही दूर तक ,
तेरा अक्स ही देख पाती हूँ !!

तेरे ना होने पर भी ,
तेरे होने की आहट सुन पाती हूँ !!
सब बंधन है ,भावों का बंधन है ,
यही कह ,खुद को समझा पाती हूँ !!

रिश्तों की मर्यादा बीच ,
खुद में ही चिंगारी जला पाती हूँ !!
पर अपने अंदर कहीं दूर तक ,
तेरे लौटते पैरों के निशां ,
ही देख पाती हूँ !!

नहीं जानती जीवन में तेरे,
किस मोड़ तक दस्तक दे पाती हूँ !!







प्रियंका राठौर

जिन्दगी







टुकड़ों में बँटी जिन्दगी ,
गुजरे लम्हों को -
कभी रसोई में ,
कभी फर्श में,
तो कभी 'तुममें' तलाशती जिन्दगी !
यादों को जोड़ने की कोशिश
फिर भी दर्द के साथ
टुकड़ों में बँटी जिन्दगी ...........!!







प्रियंका राठौर

दर्द की दवा प्रेम


प्रेम करने वाले दर्दे-दिल के गवाह हैं लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रेम दर्द का इलाज हो सकता है.
मस्तिष्क की बारीक़ी जांच से पता चलता है कि मस्तिष्क के जो हिस्से दर्द से निपटने के समय सक्रिय होते हैं वो प्रेम संबंधी विचारों के समय भी सक्रिय होते हैं.
अमरीका के स्टेनफ़र्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने 15 छात्रों को हल्का दर्द पहुंचाया और साथ ही ये देखा कि अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर देखते हुए उनका ध्यान बंटा या नहीं.
उल्लेखनीय है कि ये अध्ययन उन लोगों पर किया गया जिनके प्रणय संबंध शुरुआती दौर में थे. इसलिए हो सकता है कि प्रेम की इस दवा का असर आगे चलकर बेअसर हो जाए.
प्रेम एक सशक्त भाव
जिन वैज्ञानिकों ने ये प्रयोग किया उन्होने मस्तिष्क के अलग अलग हिस्सों की गतिविधियों को मापने के लिए फ़ंक्शनल मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग या एफ़एमआरआइ का इस्तेमाल किया.
विज्ञान जगत में ये बात जानी जाती है कि प्रेम की सशक्त भावनाएं मस्तिष्क के कई हिस्सों में गहन गतिविधि पैदा करती हैं.
इसमें मस्तिष्क के वो हिस्से भी शामिल हैं जो डोपेमाइन नामक रसायन पैदा करते हैं. इस रसायन से व्यक्ति अच्छा महसूस करता है. ये रसायन आमतौर पर मिठाई खाने के बाद या कोकेन जैसे मादक पदार्थ के सेवन के बाद पैदा होता है.
स्टेनफ़र्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया कि जब हमें दर्द की अनुभूति होती है तो हमारे मस्तिष्क के कुछ हिस्से गतिशील हो उठते हैं.
उन्होने ऐसे 15 छात्रों पर प्रयोग किया जिनका प्रणय संबंध को नौ महीने से अधिक नहीं हुए थे. इसे गहन प्रेम का पहला चरण माना जाता है.
"एक उदाहरण फ़ुटबॉल खिलाड़ी का दिया जा सकता है जो गंभीर चोट लगने के बावजूद खेलता रहता है क्योंकि वो भावात्मक आवेश की स्थिति में होता है. "
प्रोफ़ैसर पॉल गिल्बर्ट, स्नायुमनोवैज्ञानिक, डार्बी विश्वविद्यालय इंगलैंड

हर छात्र से अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर और किसी परिचित व्यक्ति की फ़ोटो लाने को कहा गया.
उन्हे ये तस्वीरें दिखाते हुए उनकी हथेली में रखे गर्मी पैदा करने वाले पैड के ज़रिए हल्का दर्द पहुंचाया गया. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान उनके मस्तिष्क का स्कैन किया गया.
स्कैन से पता चला कि उन्हे दर्द की अनुभूति अपने प्रेमी या प्रेमिका की तस्वीर देखते हुए कम हुई जबकि परिचित व्यक्ति की तस्वीर देखते हुए कुछ अधिक.
शोध में शामिल डॉ जेरैड यंगर का कहना है कि प्रेम कुछ उसी तरह काम करता है जैसे दर्द निवारक दवाएं काम करती हैं.
डार्बी विश्वविद्यालय के स्नायुमनोवैज्ञानिक प्रोफ़ैसर पॉल गिल्बर्ट का कहना है कि भावात्मक स्थिति और दर्द की अनुभूति के बीच ये संबंध स्पष्ट है.
उन्होने कहा, "एक उदाहरण फ़ुटबॉल खिलाड़ी का दिया जा सकता है जो गंभीर चोट लगने के बावजूद खेलता रहता है क्योंकि वो भावात्मक आवेश की स्थिति में होता है".
प्रोफ़ैसर गिल्बर्ट ने कहा, "ये बात समझनी ज़रूरी है कि अकेलापन और अवसाद के शिकार लोगों में दर्द झेलने की क्षमता भी बहुत कम होती है जबकि जो लोग सुरक्षित अनुभव करते हैं और जिन्हे भरपूर प्यार मिलता है वो अधिक दर्द बर्दाश्त कर सकते हैं ".



साभार : बी बी सी न्यूज़ (www.bbc.co.uk/hindi)


ख्वाब






जितनी दूरी उतने ख्वाब
फिर भी ना जाने क्यों दिल उदास !
खोने की कोशिश में पाने का अहसास
दिन और रात के संग्राम में
भोर के तारे की आवाज !
फिर भी ना जाने क्यों
म्रत्यु में जीवन का आभास !
डूबती उतरती सांसों में
कहीं एक करुणा भरा आर्तनाद !
फिर भी ना जाने क्यों
गुमनाम अँधेरे में भी रास्तों की तलाश !
जितनी दूरी उतने ख्वाब
फिर भी ना जाने क्यों दिल उदास ......!!



प्रियंका राठौर







Thursday, October 14, 2010

आदमी







आदमी करता पैदा ,
आदमी होने का भ्रम ,
आदमी करता है अब भी ,
आदमी ढोने का श्रम ,
आदमी तो बढ रहे हैं ,
आदमी फिर भी हैं  कम ,
कब शुरु होगा यहाँ पर ,
आदमी बनने का क्रम .....!!





प्रियंका राठौर