Tuesday, August 31, 2010
मंजिल
मंजिल
खुद ही मंजिल ढूँढ़ते हैं
खुद ही राहें बन जाते हैं
चलते - चलते उन पर
अपना अस्तित्व ही
खो जाते हैं ,
जीवन के इस समंदर में
बूँद ही बन रह पाते है....... !!
बेबो
बेबो
धुंधली यादों के बीच,
तन्हाई बिखरती जाती है !
जीवन की राह में चलते हुए
कदम डगमगा जाते हैं !
आगे बढनें की कोशिश में
रिश्ते छूटे जाते हैं !
अँधेरे में ही रौशनी खो जाती है
रंगों से सफेदी ही बापस आती है ,
स्याही में लिपटी हुयी जिन्दगी
मौत से बदतर नजर आती है !
एक पल में -
जीती बाजी हार नजर आती है ,
हार कर भी जीना अपनी किस्मत है
क्योकि -
बेबो की सूरत हर पल
नजरों में समाई जाती है....!!
Wednesday, August 25, 2010
प्यार
कुछ दिन से कृष्णा की पढाई बंद चल रही थी ! उदास दिखता था ! कारण - कोई कह रहा था --"उसे प्यार हो गया है" ...... पी. एच. डी. पूरी नहीं कर पा रहा........सब कुछ अस्त - व्यस्त ! दोस्तों ने समझाया ......घर में बात कर.....प्यार को पाने की कोशिश कर , नहीं तो खुद को बर्बाद कर लेगा !
कुछ दिन बाद ----कृष्णा फिर नजर आया !ख़ुशी चेहरे पर नजर आ रही थी ! पता चला.......शादी हो गयी है......"उसी से "..........!! घर में माँ बापू के सामने अनशन पर बैठ गया था .....आखिरकार बेटे की जिद रंग लायी , कृष्णा को उसका प्यार मिल गया ! लगा - कृष्णा पी. एच. डी. पूरी कर पायेगा , जीवन बदल जायेगा !
आजकल कृष्णा की पढाई फिर से बंद चल रही है ! उदास ही दिखता है ! कारण - गृहस्थी है , पत्नी है , जिम्मेदारी है , दुनियादारी भी है.........पर प्यार नहीं है !!!!!!! वह तो बदलते वक्त के साथ ना जाने कहाँ उड़ गया !!
प्रियंका राठौर
Monday, August 23, 2010
बचपन
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गुमसुम -गुमसुम, खोया खोया
आसमान को तकता बचपन !
चिड़ियों के पंखों में
पशुओं की दौड़ों में
खुद को तलाशता बचपन !
दूर कहीं झंकृत संगीत
थापों की थप- थप
रुनझुन- रुनझुन घुंघरू की
खुद ही तरसता बचपन !
घर के आँगन में,
भीड़ में, एकांत में,
कण- कण से कण-कण में
माँ को ढूंढ़ता बचपन !
एहसासों में कृन्दन
अश्रु नेत्रपटल की
ओट में,
जीवन के आयामों से
लोगों से, दीवारों से
खुद को बहलाता बचपन !
दूर कहीं --
गुमसुम-गुमसुम खोया-खोया
आसमान को तकता बचपन !!
प्रियंका राठौर
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