Tuesday, August 31, 2010

मंजिल




मंजिल




खुद ही मंजिल ढूँढ़ते हैं
खुद ही राहें बन जाते हैं
चलते - चलते उन पर
अपना अस्तित्व ही
खो जाते हैं ,
जीवन के इस समंदर में
बूँद ही बन रह पाते है....... !!

6 comments:

  1. कल 07/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  2. खूबसूरत रचना बेहतरीन सोच

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  3. priyanka ...... LAJAWAB .......... BAHUT SUNDER .....

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  4. बूँद बूँद मिल कर ही सागर बनाती है ..

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  5. बहुत बढि़या ।

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  6. गहरी अभिव्यक्ति ...

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