Friday, January 7, 2011

खोने और पाने के बीच ....





क्यूँ लगता है
खोने और पाने के बीच ,
खोने का पलड़ा भारी है !
रिश्ता है पर
भूला सा जाता है ,
बूँदें चेहरे पर
ढलक जाती हैं
और
एक साया सा घिरता आता है !
मीठी बातें ,
हंसी ठिठोली
तन्हाई बन जाती हैं !
शायद -
ध्रुव है ,
खोने और पाने के बीच ,
खोने का पलड़ा भारी है !





प्रियंका राठौर



9 comments:

  1. बहुत ही तथ्यपूर्ण रचना.....

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  2. पसंद आया यह अंदाज़ ए बयान आपका. बहुत गहरी सोंच है

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  3. अच्छी लगी आपकी कवितायें - सुंदर, सटीक और सधी हुई।
    मेरे पास शब्द नहीं हैं!!!!

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  4. बहुत सार्थक कविता| धन्यवाद|

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  5. इस खोने में भी पाना है
    इस जिन्दगी का ये फ़साना है
    जब ये समझ जाओ
    ना कुछ खोना ,ना कुछ पाना
    अच्छा लिखा ,लिखती रहो !

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  6. माना कि खोने का पलड़ा भारी है पर कुछ खोकर कुछ पाया भी जा सकता है.उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए.
    जो भी हो आप की इन पंक्तियों में बहुत ही गहरे भाव छिपे हैं.

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  7. Very Nice Mem,
    It's Poem Touch my Heart Because i know that & i have a experience holder is difference of Lost and found.
    Sincerly
    R.S.Nagie
    Sub-Editor
    Meerut Report
    &
    Treasurer
    Pragati Vigyan Sanstha, Meerut(UP)

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