Wednesday, May 4, 2011

बूँदें ....






आँखों में बूँदें
ठहर जाती हैं
महफ़िल भी
अकेला कर जाती है
कभी ढलता सूरज
तपन देता है
तो  कभी ओस की
बूँद ही भिगो जाती है !
अहसासों में ठहराव कहाँ
यादों में जिन्दगी ही
उलझी जाती है ............



प्रियंका राठौर

10 comments:

  1. bahut hi chhoti si kabita me gehre bhaaw chhupe hue....khubsurat rachna...

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  2. zindgi.........

    uljhav itna hai ki suljhaav me hi beet jati hai

    aapki kavita achhi lagi

    shukriya !

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  3. अहसासों में ठहराव कहाँ
    यादों में जिन्दगी ही
    उलझी जाती है ............

    बहुत सुन्दर गहन अभिव्यक्ति..

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  4. प्रिय प्रियंका
    बहुत सुन्दर
    एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !

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  5. ek acchi rachna aapki..
    i liked..
    कभी ढलता सूरज
    तपन देता है
    तो कभी ओस की
    बूँद ही भिगो जाती है !

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  6. "शाम से आँखों में नमी सी है,
    आज फिर तेरी कमी सी है"

    यादों का मौसम बड़ा बेरहम होता है!!

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  7. अहसासों में ठहराव कहाँ
    यादों में जिन्दगी ही
    उलझी जाती है ............
    बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति, बधाई तो देनी ही पड़ेगी ..

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  8. क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ. आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

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  9. यादों के सिलसिले, अच्छी कविता के माध्यम से. बहुत सुंदर.

    मातृदिवस की शुभकामनाएँ

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