Monday, September 23, 2013

रफ़्तार ....




जो रफ़्तार में थे
उन पीले गुलमोहरों पर
बैठी तितली को ना देख पाए ।
ना छू पायें उस ऒस की बूँद को ,
जो सुबह सुबह घास के आखिरी छोर पर टिकी थी ।
जो रफ़्तार में थे
मूंगफली के दानों को कुतर कुतर कर खाती उस गिलहरी को पीछे छोड़ गये ,
घर की बालकनी में रखा तुलसी का पौधा सूख रहा है ।
पिज़्ज़ा बर्गर की होम डिलीवरी में , माँ का हलुआ पुड़ी छूट चूका है ।
वो जो रफ़्तार में थे
सब कुछ पीछे छोड़ गए हैं ...
रिश्ते नाते , प्यार अपनापन ,
सब कुछ गति में भूल चुके हैं ...!




प्रियंका राठौर

Monday, August 5, 2013

अधूरे तुम ... ( लघु कहानी )



उस फिसलन भरे समय में तुम्हारा आना भी , आभासी चादर ओढ़े किसी अप्रत्याशित घटना से कम ना था | कातर आवाजों और चीत्कारों के बीच वह पल अँधेरे में जुगनू सी चमक और अनदेखे सपने दे गया था | शायद पहली बार तुम्हे महसूस करने का क्रम शुरू हुआ था , जोकि अनवरत चलता रहेगा , कभी सोचा ना था | कतरनों से जोड़े गए सामान , तुम्हारे अनछुए स्पर्श का आभास कराते थे | मन खुशियों से भर उठता , तुम्हारी आहटों की गूँज सुनने को कान लालायित होने लगते | बस – पहिये से घूमतें समय में इन्तेजार शेष था !

तुम आ गए थे अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ | क़दमों की थापों के साथ घूमतीं तुम्हारी आँखें , आत्मा तो रोमांचित कर देती थी | एक कमरे से दूसरे कमरे का सफर तय करने में भी वक्त लगता क्योकि तुम्हारी आवाजें पीछा करती और कदम खुद बा खुद तुम्हारे करीब ले आते | वक्त के साथ बंधन बंध रहा था | सिर्फ एक गति जो स्वरों से भरपूर है , पूरे जीवन का मायने बदल देती है | आप दूर जाना चाहें तो वह करीब खीचती है और जब करीब आ जाएँ तो आत्मा में समा जाती है | गति के अंतस में सामने का यही क्रम तो एक नए निर्माण या नए स्वरूप का प्रारंभ है |

स्वयं का रूपांतरण भी प्रक्रति ने निश्चित कर दिया था | सब कुछ बदल रहा था , हर दिन कोई नया संकेत लेकर आता था | और एक दिन अचानक सारी  संवेदनाओं को किनारे कर तुम दूर चले गए थे | जिन्दगी जो तुमसे ऊर्जा पा रही थी , एकाएक खामोश हो गयी | भीड़ , चौराहे , घर , बाजार , हर ओर तुम्हारी दी हुयी ख़ामोशी पसरने लगी थी | साथ ही अस्तित्व पर भी अपनी मुहर लगा रही थी | कि अचानक तुम फिर नजर आये | लेकिन इस बार – बारी ... तुम्हारी थी – स्वर विहीन होने की ... गति हीन होने की | मांस के लोथड़े से तुम .... क्या करूँ तुम्हारा .... कहाँ से शुरू करूँ .... या युहीं तुम्हे नियति को सौंप दूँ .... कशमकश थी , उलझन थी ... की तुम्हारे रुदन में एक स्वर सुनाई दिया , कुछ गति में झनझनाहट शेष महसूस हुयी | इसके साथ सब निश्चित हो गया , जीवन तो अब शुरू होना था , स्वयं से परे .... आधार से विलग ... संसार से विरक्त ...|

अब तुम थे , मैं थी और तुम्हारी स्थिर आँखें | जिनको समझ कर मुझे तुम्हारे चारों ओर  घूमना था | इस घूमने में कभी खीझ तो कभी झुंझलाहट होती , तो कभी प्रक्रति से ही वाक् युद्ध हो जाता , फिर भी तुम्हारी स्थिरता ठहराव नहीं दे पा रही थी | शायद ये समझने में वक्त लगा .. जो दिखता है वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं | तुम पास थे लेकिन साथ नहीं , तुम्हे साथ लाना था | अब समय था , तुम्हे मन की आँखों से देखने का , महसूस करने का | कभी किसी तान पर चंचल होती नजरें .. या कुछ पाने के लिए थिरकती उँगलियाँ या कभी अनायास ही स्वर का उतार चढाव , समझ आने लगा था | लोगों से परे एक अलग ही दुनिया रचने बसने लगी थी | स्पर्श और भावनाओं की महत्ता अब समझ आती है | यही तो हैं , जो अर्थहीन निष्प्राण पिंड को भी गतिमान बना सकते हैं | शायद ईश्वर भी यही है .... भावनाओं और आशाओं का चरम .... जब कुछ नहीं होता ... तब वह होता है |

वक्त के कदम कभी ठिठके नहीं | हम तुम उसकी चाल से चाल मिलाकर बढ़ रहे हैं | सब कहते हैं तुम अधूरे हो , लेकिन मेरे साथ तो तुम पूरे हो | क्या कहूँ – तुम्हारी गति भी मैं , तुम्हारी नियति भी मैं ... अब तुम .. मैं और ये बंधन – बेनाम सा .. लेकिन अर्थों में ढला सा ... जिन्दगी से जुड़ा सा ... रिश्तों से परे | कल पर वश नहीं , फिर भी मुझे मालूम है , तुम्हारा सत्य निश्चित है | तुम नहीं होगे , तब तुम्हारे इस अधूरेपन के साथ , तुम पर एक कहानी लिखूंगी ... तुम्हारी पूर्णता के लिए | हाँ – अगले जन्म तुमसे फिर मिलना चाहूंगी क्योकि तुमसे बेहतर कोई नहीं |



प्रियंका राठौर 

Sunday, July 28, 2013

कुछ अनछुई स्म्रतियां .....



बहुत समय बाद महा देवी जी की मेरा परिवार पुनः कांपते हाथों से पढने को उठाई । (कांपते हाथों से उठाने का अभिप्राय शायद अनुभूतियों की तीव्रता से उत्पन्न बेचैनी को ना झेलने की मन: स्थिति ही हो सकती है ।) बढ़ते हुए पन्नों की संख्या के साथ बचपन की मीठी स्मृतियाँ चलचित्र की भांति आँखों के सामने से गुजरने लगी । संवेदना का कहीं गहरे पैठ बना लेना महसूस हो आया । बालमन कितना निश्छल होता है ,सारे 'आ-जरुरी' पात्रों के लिए भी सुख दुःख महसूस कर पाना उन्ही के वश की बात है ।


इस समय खुद पर हँसूँ या संवेदना की गहराई मापूं ,समझ नहीं पा रही ...! 


उठते हुए गुबार में ... पहली कड़ी शेरू नजर आता है .. घी से चुपड़ी रोटी में चीनी लगाकर एक एक कौर बनाकर ..उसको खिलाना ।या फिर मम्मा से बहस करना की शेरू की रोटी मुझे बनानी है क्योकि उसे पतली रोटी पसंद है और आप मोटी रोटी बनाते हो  आज भी उसके जाने की टीस आंसुओं का सैलाब उमड़ा देती है ।


तो कभी कोमू की द्रुत गति अनायास ही पीछा करने लगती है ... ना ना पप्पू उसे पूरा गाजर क्यों दिया ...वो छोटा बेबी है ...उसको छोटा पीस खाना है और पप्पू से छुरी छीन खुद ही छोटे टुकड़े बना कर हाथ से खिलाना ,भले ही काटते हुए उँगलियाँ शहीद हो जाएँ ।


दूर गगन के उड़ते पंछियों में आज भी निगाहें ना जाने क्यों गोला ... पिद्दी और फुसरा को ढूंढना शुरू कर देती हैं । राजपूत परिवार की बिटिया और अंडे ..मीट ..मछली से भयानक किस्म की दूरी  राज है ... जो उन कबूतरों के अण्डों में छिपा है । वे अंडें जिनसे छोटे छोटे गुलाबी रंगत लिए बच्चे निकलते थे और जिनका रुई के फाये बनने तक का सफ़र ,कभी मेरी आँखों से छूटा ना था । जो मेरी जान से थे ... उनके जैसो को हजम कर लेना मेरी सोच से भी परे था ..।


कुछ और भी कड़ियाँ हैं ... वो मुझे आवाज देने वाला मिट्ठू ... वो लंगुरी बन्दर का बच्चा ....सफ़ेद चूचु ... और मेरी फिंच । कितना अलग अहसास है ...जिसे महसूस करने के लिए मेरी सी मन की आँखें चाहिए ..कोई पास नहीं है ...लेकिन कोई कभी दूर भी नहीं गया । इन कंकरीट के जंगलों में उन सबके अहसास जल के स्रोते जैसे ही हैं , जो आत्मा को तृप्त करते हैं । वक्त पलटता नहीं , लेकिन बचपन से शुरू हुआ ये संवेदनाओं का दौर आज भी अनवरत क्रम से बह रहा है , बस पात्र बदलने लगें हैं या ये कहूँ नए पात्र जुड़ने लगे हैं तो ज्यादा बेहतर होगा ।





प्रियंका राठौर

Thursday, March 28, 2013

यार – तुम लड़के .......





यार –
तुम लड़के .......
क्यों नहीं किसी एक के
हो पाते हो ....
बस –
भवरें की तरह ,
हर फूल पर मंडराते हो .....!
या कुछ यूँ कहूँ ...
जो भी
किसी एक का
ना हो पायेगा ,
जीवन भर उस भूत की तरह
किसी अँधेरे कुएं से
निकलने की आस में
अकेले फड़फड़ायेगा .....
सुकून ना मिल पायेगा ....
सुकून ना मिल पायेगा .....!!!!!!

प्रियंका राठौर 

Monday, March 4, 2013

पलाश के फूल .....




जब पड़ा था 
पहला कदम तुम्हारा 
मेरे आँगन में ,
तब -
वो फूल  ही तो थे 
पलाश के ,
जो बिखरे थे 
मेरे आँचल में ......!!!!!


प्रियंका राठौर 

Friday, January 25, 2013

बना रहे सपने देखने का अधिकार.....




शब्द। मैं नहीं जानती कि कहां से आते हैं। एक लेखिका जो वेदना में है। शायद, इस अवस्था में पुन: जीने की इच्छा एक शरारतभरी इच्छा है। अपने 90वें वर्ष से बस थोड़ी ही दूर पहुंचकर मुझे मानना पड़ेगा कि यह इच्छा एक संतुष्टि देती है, एक गाना है न 'आश्चर्य के जाल से तितलियां पकड़ना..' इसके अतिरिक्त उस 'नुकसान' पर नजर दौड़ाइए जो मैं आशा से अधिक जीकर पहुंचा चुकी हूं। 88 या 87 साल की अवस्था में मैं प्राय: छायाओं में लौटते हुए आगे बढ़ती हूं। कभी-कभी मुझमें इतना साहस भी होता है कि फिर से प्रकाश में चली जाऊं। मैं स्वयं को दोहरा रही हूं। जो हो चुका है उसे आपके लिए फिर से याद कर रही हूं। जो है, जो हो सकता था, हुआ होगा।
अब स्मृति की बारी है कि वह मेरी खिल्ली उड़ाए। मेरी मुलाकात कई लेखकों, मेरी कहानियों के चरित्रों, उन लोगों के प्रेतों से होती है जिन्हें मैंने 'जिया' है, प्यार किया है और खोया है। कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं एक ऐसा पुराना घर हूं जो अपने वासियों की बातचीत का सहभागी है, लेकिन हमेशा यह कोई वरदान जैसा नहीं होता है! लेकिन 'यदि कोई व्यक्ति अपनी शक्ति के अंत पर पहुंच जाए तब क्या होगा?' शक्ति का अंत कोई पूर्णविराम नहीं है। न ही यह वह अंतिम पड़ाव है जहां आपकी यात्रा समाप्त होती है। यह केवल धीमा पड़ना है, जीवनशक्ति का ह्रास। वह सोच जिससे मैंने प्रारंभ किया था वह है 'आप अकेले हैं।' शांतिनिकेतन में थी, प्रेम में पड़ी, जो कुछ भी किया बड़े उत्साह से किया। 13 से 18 वर्ष की अवस्था तक मैं अपने एक दूर के भाई से बहुत प्रेम करती थी। उसके परिवार में आत्मघात की प्रवृत्ति थी और उसने भी आत्महत्या कर ली। सभी मुझे दोष देने लगे, कहने लगे कि वह मुझे प्यार करता था और मुझे न पा सका इसीलिए उसने आत्मघात कर लिया। यह सही नहीं था। उस समय तक मैं कम्युनिस्ट पार्टी के निकट आ चुकी थी और सोचती थी कि ऐसी छोटी अवस्था में यह कितना घटिया काम था। मुझे लगता था कि उसने ऐसा क्यों किया। मैं टूट गई थी। पूरा परिवार मुझे दोष देता था। जब मैं सोलह साल की हुई, तभी से मेरे माता-पिता विशेषकर मेरे संबंधी मुझे कोसते थे कि इस लड़की का क्या किया जाए। यह इतना ज्यादा बाहर घूमती है। तब इसे बुरा समझा जाता था। मध्यवर्गीय नैतिकता से मुझे घृणा है। यह कितना बड़ा पाखंड है। सब कुछ दबा रहता है। लेखन मेरा वास्तविक संसार हो गया, वह संसार जिसमें मैं जीती थी और संघर्ष करती थी। समग्रत:। मेरी लेखन प्रक्रिया पूरी तरह बिखरी हुई है। लिखने से पहले मैं बहुत सोचती हूं, विचार करती हूं, जब तक कि मेरे मस्तिष्क में एक स्पष्ट प्रारूप न बन जाए। जो कुछ मेरे लिए जरूरी है वह पहले करती हूं। लोगों से बात करती हूं, पता लगाती हूं। तब मैं इसे फैलाना आरंभ करती हूं। इसके बाद मुझे कोई कठिनाई नहीं होती है, कहानी मेरी पकड़ में आ चुकी होती है। जब मैं लिखती हूं, मेरा सारा पढ़ा हुआ, स्मृति, प्रत्यक्ष अनुभव, संगृहीत जानकारियां सभी इसमें आ जाते हैं।
जहां भी मैं जाती हूं, मैं चीजों को लिख लेती हूं। मन जगा रहता है पर मैं भूल भी जाती हूं। मैं वस्तुत: जीवन से बहुत खुश हूं। मैं किसी के प्रति देनदार नहीं हूं, मैं समाज के नियमों का पालन नहीं करती, मैं जो चाहती हूं करती हूं, जहां चाहती हूं जाती हूं, जो चाहती हूं लिखती हूं। नरक के कई नाम हैं। एक नाम जो मुझे विशेष पसंद है, वह है ओशि पत्र वन। ओशि का अर्थ तलवार है। और पत्र अर्थात एक पौधा जिसके तलवार सरीखे पत्ते हों। ऐसे पौधों से भरा हुआ जंगल। और आपकी आत्मा को इस जंगल से गुजरना होता है। तलवार सरीखे पत्ते उस में बिंध जाते हैं। आखिर आप नरक में अपने पापों के कारण ही तो हैं। इसलिए आपकी आत्मा को इस कष्ट को सहना ही है। अंत में मैं उस विचार के बारे में बताऊंगी जिस पर मैं आराम से समय मिलने पर लिखूंगी। मैं अरसे से इस पर सोचती रही हूं। वैश्वीकरण को रोकने का एक ही मार्ग है। किसी जगह पर जमीन का एक टुकड़ा है। उसे घास से पूरी तरह ढक जाने दें। और उस पर केवल एक पेड़ लगाइए, भले ही वह जंगली पेड़ हो। अपने बच्चे की तिपहिया साइकिल वहां छोड़ दीजिए। किसी गरीब बच्चे को वहां आकर उससे खेलने दीजिए, किसी चिड़िया को उस पेड़ पर रहने दीजिए। छोटी बातें, छोटे सपने। आखिर आपके भी तो अपने छोटे-छोटे सपने हैं। कहीं पर मैंने 'दमितों की संस्कृति' पर लिखने का दावा किया है। यह दावा कितना बड़ा या छोटा, सच्चा या झूठा है? जितना अधिक मैं सोचती और लिखती हूं, किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उतना ही कठिन होता जाता है। मैं झिझकती हूं, हिचकिचाती हूं। मैं इस विश्वास पर अडिग हूं कि समय के पार जीने वाली हमारे जैसी किसी प्राचीन संस्कृति के लिए एक ही स्वीकार्य मौलिक विश्वास हो सकता है-सहृदयता। सम्मान के साथ मनुष्य की तरह जीने के सभी के अधिकार को स्वीकार करना।
लोगों के पास देखने वाली आंखें नहीं हैं। अपने पूरे जीवन में मैंने छोटे लोगों और उनके छोटे सपनों को ही देखा है। मुझे लगता है कि वे अपने सारे सपनों को तालों में बंद कर देना चाहते थे, लेकिन किसी तरह कुछ सपने बच गए। कुछ सपने मुक्त हो गए। जैसे गाड़ी को देखती दुर्गा , एक बूढ़ी औरत, जो नींद के लिए तरसती है, एक बूढ़ा आदमी जो किसी तरह अपनी पेंशन पा सका। जंगल से बेदखल किए गए लोग, वे कहां जाएंगे। साधारण आदमी और उनके छोटे-छोटे सपने। उनका अपराध यही था कि उन्होंने सपने देखने का साहस किया। उन्हें सपने देखने की भी अनुमति क्यों नहीं है? जैसा कि मैं सालों से बार-बार कहती आ रही हूं, सपने देखने का अधिकार पहला मौलिक अधिकार होना चाहिए। यही मेरी लड़ाई है, मेरा स्वप्न है। मेरे जीवन और मेरे साहित्य में।
[लेखक महाश्वेता देवी, जयपुर साहित्योत्सव 2013 के उद्घाटन भाषण का संपादित अंश]

साभार दैनिक जागरण 


Thursday, January 24, 2013

मेरा स्वप्न......





रचने चली हूँ 
फिर एक संसार ...
जिसमे है -
वो टिमटिम आँखों वाली 
दुबली पतली बार्बी ...
साथ खड़ा वो 
मासूम हरा श्रैक .....
न जाने कहाँ से .
आया टॉम यहाँ पर 
शायद कर  रहा है 
पीछा प्यारे जैरी का ....
ये क्या !
काकश ने पीछे से आकर 
 खाया है  काट 
मेरे गोलू श्रैक  को ..
गोल गोल सी आँखों में 
अब मोटी मोटी बूँदें हैं .....

ऐ बार्बी -
रोक लो  श्रैक  के 
आंसुओं को 
आएगी विली तो 
काकश के कन्पुच्ची लगाएगी ..
अरे  आज तो -
मोगली के साथ 
छोटा भीम भी है ....
लगता है -
फिर आज एक 
नया खेल शुरू हो जायेगा .....

अर्र ....अर्र .....
ये क्या ......
होने लगा क्यों 
ये संसार कुछ धुंधला सा ....

धत्त ....

वो तो प्यारा सपना था 
जो खुली आँखों से देखा था .....
सारे पात्र मेरी 
मुस्कराहटों के -
एक साथ सब 
एक स्वप्न तले ........

क्यों गुड है ना :)


प्रियंका राठौर