Thursday, March 3, 2011

हर - हर गंगा ..................









किसी हिम तुंग शिखर के अंचल में
मधुर चांदनी छिटक रही है .
वहीं कहीं वह बलखाती सी
पावन , निर्मल , निष्कलुष , पवित्र 
सुरसरी तरुणी विचरण  करती है .
नाम है गंगा ....
ब्रह्म पुत्री  गंगा .....
श्वेत धवल चीर में लिपटी 
अम्बुज की वीणा में उलझी 
अंग - अंग में अमिय है जिसके 
ना जाने है किस सोच में अटकी -
चेहरे के उतरते चढ़ते भावों में
गहरे दर्द का आभास है
खुद ही खुद से बोल रही है
आह !
कैसी ये नियति है
रूप लावण्य संग दिया ब्रहम ने
कैसा ये सैलाब है ....
इतना वेग -
इतना वेग -
हो जाये जिसमें स्रष्टि ही सारांश
क्या मेरे इस वेग को
पायेगा संभाल कोई
क्या मै भी कभी हो पाऊंगी पूर्ण .

विचारों के इस उथल - पुथल बीच
एक आवाज सुनाई दी -
हे गंगे -
ब्रहम ने तुम्हे बुलाया है
आया है लेने तुम्हे
कोई भागीरथ धरा से
करना है तुम्हे बसुधा को सिक्त
जो सूख रही है बिन नीर के .
भस्म हुए जीवन में भी देना है तुमको जीवन
तभी हो पायेगी मुक्ति संभव उनकी .

पहुंची गंगा ब्रह्म के पास
बोली -
प्रभु ! आपकी आज्ञा सर आँखों पर
परन्तु है एक प्रश्न
भरा है मुझमे इतना वेग
उच्छ्लंख , अद्भुत , प्रलयंकर
डूब ना जायेगा सब कुछ
जब मै जाऊंगी बसुधा पर .
बोले ब्रह्म -
नहीं पुत्री -
इसका भी है उपाय एक
स्रष्टि नियामक , स्रष्टि पालक , स्रष्टि संहारक
नीलकंठ तुम्हारे वेग को
उल्झायेंगें अपने केशों में
तब उतरोगी तुम
एक धारा बन धरणी पर .
सोच रही थी गंगे उस पल
ओह ! शशिशेखर - गौरी पति
क्या मुझे संभालेंगे
क्या होउंगी मै तृप्त कभी
क्या मेरा वेग भी दिशा पा जायेगा .....

चली सुरसरी पाकर ब्रह्म की आज्ञा
कल - कल , हल - हल ,आवाजों के संग
आया था उफन तूफान भयंकर
चारों ओर गंगा ही थी गुन्जायेमान
सुर , नर , मुनि , सभी  रहे  थे देख 
उस  विस्मयकारी  पल को 
आज तो प्रलय है निश्चित 
यही सबके चेहरों पर थे भाव 
देख गंगे का अद्भुत वेग 
भागीरथ भी पड़ गए सोच में 
क्या धरा इस वेग को झेल पायेगी 
हाहाकार मच जायेगा 
हो जायेगा सब कुछ तहस  नहस .
चली आ रही थी मदमाती गंगा 
नजर आये सामने गिरिजापति 
कराल , महाकाल  , काल  कृपाल 
प्रचंड , प्रक्र्ष्ट , नेत्र  विशाल 
हाथ में डमरू , कंठ  भुजंग माला 
माथे पर चन्द्र  तिलक , नंदी का था साथ 
एक मनमोहक  मुस्कान  लिए 
खड़े थे थामने उस वेग को .

नयनों ही नयनों में किया प्रणाम 
मन ही मन वह कह रही थीं 
हे महादेव -
दे दी है तिलांजली वर्षों के इंतजार  को
संभाल सको तो संभाल लो मुझको
अब ना रुक सकुंगी मै ....
तभी पुष्पों की बरसात हुयी
ढोल , म्र्दंग , बाजों  की झंकार हुयी
बदल गया था द्रश्य वहां का
गंगा थी अब हर की गंगा
शिव भी थे अब शांत  चित्त 
बह रही थी अब छोटी धारा
जो थी अडिग  कर्तव्य पथ पर

तब बोले भोले भंडारी -
आह !
उस समुद्र मंथन में 
जब विष का मैंने पान किया 
लोक कल्याण में खुद पर ही आघात किया 
एक ज्वाला थी जो बुझती ना थी 
हर पल जी को झुलसती थी
हुआ आज मै तृप्त साथ तुम्हारा पाने से
अब तुम हो शक्ति , जीवनदायनी  हर  की गंगा
दो बराबर मेरे , एक तुम हो
हर - हर गंगे ,
हर - हर गंगे ,
इन्ही शब्दों में है अब जीवन
जाओ गंगे करो कर्तव्यों का तुम  निर्वाह 
कह इतना भोले हो गये  फिर से लीन
चली गंगा धरा पर भागीरथ संग
होकर शांत चित्त कर्तव्य अपने पूरे करने को 
हुआ पूर्ण प्रण भागीरथ का
सुरसरी भागीरथी  है अब यही अवनि पर
खोजती सी जीवन में जीवन का सत्य

कैसी ये विडंबना है 
कैसा है ये मिलन - विछोह
मिलकर भी ना मिल पाए
फिर भी बन गयी एक कथा अमर 
हर की गंगा 
हर - हर गंगा 
हर की गंगा 
हर - हर गंगा ..................










प्रियंका राठौर  

  

22 comments:

  1. इस शिवरात्री पर लिखी गयी..बहुत ही सुंदर रचना....बेहद खुबसुरत लेखनी....
    *साहित्य प्रेमी संघ*

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  2. Bahut sunder
    Ganga tera pani amrit jhar jhar bahata jaye

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  3. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (05.03.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  4. सुंदर रचना ....कमाल का शाब्दिक अलंकरण प्रियंका .... बधाई

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  5. jaisa ki main bol chuki hoon priyanka ... aisa laga jaise sab aankhon ke saamne ho raha ho ... bahut achha likha hai :)

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  6. ओह ! शशिशेखर - गौरी पति
    क्या मुझे संभालेंगे
    क्या होउंगी मै तृप्त कभी
    क्या मेरा वेग भी दिशा पा जायेगा .....

    गहन अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...बधाई

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  7. Wonderful post ....... Beautiful expression !

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  8. बहुत ही गहरे भाव लिये हुये ..लाजवाब प्रस्‍तुति ।

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  9. बहुत सुन्दर...लाज़वाब शब्दचित्र..

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  10. aap sabhi ka bhut bhut dhanybad....

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  11. तीव्र तृषा जब गंगा जल से शांत हुई,,
    तब बह निकली य कविता ..

    बहुत सुन्दर .

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  12. उस समुद्र मंथन में
    जब विष का मैंने पान किया
    लोक कल्याण में खुद पर ही आघात किया
    एक ज्वाला थी जो बुझती ना थी
    हर पल जी को झुलसती थी
    हुआ आज मै तृप्त साथ तुम्हारा पाने से
    अब तुम हो शक्ति , जीवनदायनी हर की गंगा

    अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...बधाई

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  13. di itni sundar rachna k liye main apko cmnt du.. i think ye bahut galat hoga.. really bahut hi or ghubsurat rachna h ye apki.. or apni soch or bhavnao ko apne apni kalam k sath jis tarah se vyakt kiya h wo wakai me kabile tarif h.. thank u 4 giving a very wndrfl n "avisvaraniya rachna" to ds world

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  14. @yagyanik- dear tum bhi hindi jante ho ye nahi socha tha....thanks alot

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  15. @arvind ji
    @kushwansh ji
    mere blog pr aane ke liye bhut bhut dhanybad...

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  16. bahut hi badiya abhivakti ki hai aapne...sabdavali bhi bahut achchi hai...

    I would like to read you more...

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  17. बहुत ही गहरे भाव लिये हुये, लाजवाब प्रस्‍तुति| धन्यवाद|

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  18. बहुत सुन्दर अच्छी लगी आपकी हर पोस्ट बहुत ही स्टिक है आपकी हर पोस्ट कभी अप्प मेरे ब्लॉग पैर भी पधारिये मुझे भी आप के अनुभव के बारे में जनने का मोका देवे
    दिनेश पारीक
    http://vangaydinesh.blogspot.com/ ये मेरे ब्लॉग का लिंक है यहाँ से अप्प मेरे ब्लॉग पे जा सकते है

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  19. आदरणीय प्रियंका जी , सादर प्रणाम

    आपके बारे में हमें "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" पर शिखा कौशिक व शालिनी कौशिक जी द्वारा लिखे गए पोस्ट के माध्यम से जानकारी मिली, जिसका लिंक है...... http://www.upkhabar.in/2011/03/jay-ho-part-2.html

    इस ब्लॉग की परिकल्पना हमने एक भारतीय ब्लॉग परिवार के रूप में की है. हम चाहते है की इस परिवार से प्रत्येक वह भारतीय जुड़े जिसे अपने देश के प्रति प्रेम, समाज को एक नजरिये से देखने की चाहत, हिन्दू-मुस्लिम न होकर पहले वह भारतीय हो, जिसे खुद को हिन्दुस्तानी कहने पर गर्व हो, जो इंसानियत धर्म को मानता हो. और जो अन्याय, जुल्म की खिलाफत करना जानता हो, जो विवादित बातों से परे हो, जो दूसरी की भावनाओ का सम्मान करना जानता हो.

    और इस परिवार में दोस्त, भाई,बहन, माँ, बेटी जैसे मर्यादित रिश्तो का मान रख सके.

    धार्मिक विवादों से परे एक ऐसा परिवार जिसमे आत्मिक लगाव हो..........

    मैं इस बृहद परिवार का एक छोटा सा सदस्य आपको निमंत्रण देने आया हूँ. यदि इस परिवार को अपना आशीर्वाद व सहयोग देने के लिए follower व लेखक बन कर हमारा मान बढ़ाएं...साथ ही मार्गदर्शन करें.


    आपकी प्रतीक्षा में...........

    हरीश सिंह


    संस्थापक/संयोजक -- "भारतीय ब्लॉग लेखक मंच" www.upkhabar.in/

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  20. Priyanka! bahut achha likha hai aapne, cool

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  21. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति !
    शुभकामनायें !

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  22. अनुभूतियों की सुन्दर अभिव्यक्ति ...बधाई

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