Sunday, September 11, 2011

वजूद ...




सीमित दायरों
में बंध
जीवन हो गया
निरुत्तर प्रश्न ......

खोज - खोज
कर मायनों को
वजूद ही
हो गया
अंतिम प्रश्न ........


प्रियंका राठौर

15 comments:

  1. खोज - खोज
    कर मायनों को
    वजूद ही
    हो गया
    अंतिम प्रश्न ......waah! ati sundar...

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  2. खोज - खोज
    कर मायनों को
    वजूद ही
    हो गया
    अंतिम प्रश्न ........


    यह बजूद की खोज और हमारा लक्ष्य ...लेकिन कहाँ हो पाता है अंतिम लक्ष्य तय ...गहरे भावों का सम्प्रेषण ....आपका आभार

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  3. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ||
    आपको बहुत बहुत बधाई ||

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  4. आप की रचना पढ़ी अच्छी लगी।

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  5. अंतिम प्रश्न ....का क्या कभी कोई उत्तर मिलेगा ?????

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  6. वजूद की खोज सबसे ज्यादा भटकाने वाली होती है

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  7. seemit shabdon mein anginat prashno ko prastut kar diya...
    behtareen...

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  8. बजूद को खोजना ही ज़िंदगी है , बहुत खूब ....

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  9. गंभीर सवाल!
    आशीष
    --
    मैंगो शेक!!!

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  10. प्रश्नों के उत्तर खोजते खोजते कभी कभी प्रश्न गौण हो जाता है ... पर तलाश जारी रहती है .. जिसकी जरूरत नहीं होती ...

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  11. सुन्दर कविता प्रियंका बधाई और शुभकामनाएं

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  12. साढ़े छह सौ कर रहे, चर्चा का अनुसरण |
    सुप्तावस्था में पड़े, कुछ पाठक-उपकरण |

    कुछ पाठक-उपकरण, आइये चर्चा पढ़िए |
    खाली पड़ा स्थान, टिप्पणी अपनी करिए |

    रविकर सच्चे दोस्त, काम आते हैं गाढे |
    आऊँ हर हफ्ते, पड़े दिन साती-साढ़े ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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